कानपुर संवाददाता (शोभित पाण्डेय)।

जंग में जख्मी एक सैनिक लोगो से कहता है:
‘दोस्त घर जाकर मत कहना, इशारों में बता देना,
अगर हाल मेरी मां पूछे तो, जलता दिया बुझा देना
फिर भी न समझे तो दो आंसू तुम बहा देना
अगर हाल मेरी बहिन पूछे तो, सूनी कलाई से राखी हटा दिखला देना,
इतने पर भी न समझे तो, राखी तोड़ दिखा देना
अगर हाल मेरी बीवी पूछे तो, सर तुम झुका लेना,
इतने पर भी न  समझे तो, माथे का कुमकुम तुम मिटा देना,
अगर हाल मेरे पिता पूछे तो, हाथों को सहला देना,
इतने पर भी न समझे तो, लाठी तोड़ दिखा देना!
अगर हाल मेरी बेटी पूछे तो, सर पर हाथ उसके सहला देना,
इतने पर भी न समझे तो, गले से उसको लगा लेना!
अगर हाल मेरा बेटा पूछे तो, खाली राह दिखा देना!
इतने पर भी न समझे तो, सैनिक धर्म बता देना!
अगर हाल मेरा दोस्त पूछे, तो मीठी यादे उसको याद दिला देना, इतने पर भी ना समझे तो सैनिकों का कर्तव्य उसे दिखा देना , अगर रोए कोई तो हाथो से आशु पोछ देना, इतने पर भी ना समझे तो हालातो से समझौता करना सीखा देना और सैनिक धर्म बता देना।

लेखक ट्विंकल वर्मा।